श्री क्षत्रिय युवक संघ के संस्थापक 

Biography

स्व.पु.श्री तनसिंह जी: एक अद्भभुत व्यक्तित्व का परिचय वि.सं.१९८० में बाड़मेर जिले के गांव रामदेरिया के ठाकुर बलवंत सिंह जी महेचा की धर्म पत्नी मोतिकंवरजी के गर्भ से तनसिंह जी का जन्म अपने मामा के घर बैरसियाला गांव में हुआ था वे अभी शैशवावस्था में अपने घर के आँगन में चलना ही सीख रहे थे कि उनके पिता मालाणी के ठाकुर बलवंत सिंघजी का निधन हो गया और चार वर्ष से भी कम आयु का बालक तनैराज अपने सिर पर सफ़ेद पाग बाँध कर ठाकुर तनैराज हो गया | मात्र ९०रु वार्षिक आय का ठाकुर | भाग्य ने उनको पैदा करके पालन-पोषण के लिए कठिनाईयों के हाथों सौप दिया | घर की माली हालत ठीक न होने के बावजूद भी श्री तनसिंह जी ने अपनी प्राथमिक शिक्षा बाड़मेर से पुरी कर सन १९४२ में चौपासनी स्कूल जोधपुर से अच्छे अंकों के साथ मेट्रिक परीक्षा पास कर सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी होने का गौरव प्राप्त किया,और उच्च शिक्षा के लिए पिलानी चले आए जहाँ उच्च शिक्षा ग्रहण करने बाद नागपुर से उन्होंने वकालत की परीक्षा पास कर सन १९४९ में बाड़मेर आकर वकालत का पेशा अपनाया,पर यह पेशा उन्हें रास नही आया |  25 वर्ष की आयु में बाड़मेर नगर वासियों ने उन्हें बाड़मेर नगर पालिका का अध्यक्ष चुन लिया और 1952 के विधानसभा चुनावों में वे पहली बार बाड़मेर से विधायक चुन कर राजस्थान विधानसभा पहुंचे और 1957 में दुबारा बाड़मेर से विधायक चुने गए | 1962 व 1977 में आप बाड़मेर लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए | 1962 में तन सिंघजी ने दुनिया के सबसे बड़े और विशाल बाड़मेर जैसलमेर निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव मात्र एक जीप,कुछ साथी,सहयोगी स्वयम सेवक,कार्यकर्त्ता,किंतु अपार जन समूह के प्यार और समर्थन से मात्र 9000 रु. खर्च कर सांसद बने | 1979 में मध्यावधि चुनावों का फॉर्म भरने से पूर्व अपनी माताश्री से आशीर्वाद लेते समय 7 दिसम्बर 1979 को श्री तनसिंह जी ने अपनी माता की गोद में ही अन्तिम साँस ली | पिलानी के राजपूत छात्रावास में रहते हुए ही श्री तनसिंह जी ने अपने भविष्य के ताने-बाने बुने | यहीं उनका अजीबो-गरीब अनुभूतियों से साक्षात्कार हुआ और समाज की बिखरी हुयी ईंटों से एक भव्य-भवन बनाने का सपना देखा | केवल 22 वर्ष की आयु में ही उनके हृदय में समायी समाज के प्रति व्यथा पिघली जो " श्री क्षत्रिय युवक संघ" के रूप में निश्चित आकार धारण कर एक धारा के रूप में बह निकली |  लेकिन अन्य संस्थाओं की तरह फॉर्म भरना,सदस्यता लेना,फीस जमा करना,प्रस्ताव पारित करना,भाषण,चुनाव,नारेबाजी,सभाएं आदि करना श्री तन सिंह जी को निरर्थक लगी और 22 दिसम्बर 1946 को जयपुर के मलसीसर हाउस में नवीन कार्य प्रणाली के साथ "श्री क्षत्रिय युवक संघ " की विधिवत स्थापना की और उसी दिन से संघ में वर्तमान संस्कारमयी मनोवैज्ञानिक कार्य प्रणाली का सूत्रपात हुवा | इस प्रकार क्षत्रिय समाज को श्री तनसिंह जी की अमूल्य देन "श्री क्षत्रिय युवक संघ " अपनी नई प्रणाली लेकर अस्तित्व में आया | राजनीती में रहकर भी उन्होंने राजनीती को कभी अपने ऊपर हावी नही होने दिया | क्षत्रिय युवक संघ के कार्यों में राजनीती भी उनकी सहायक ही बनी रही | सन 1955-56 में विवश होकर राजपूत समाज को राजस्थान में दो बड़े आन्दोलन करने पड़े जो भू-स्वामी आन्दोलन के नाम से विख्यात हुए,दोनों ही आन्दोलनों की पृष्ठभूमि में क्षत्रिय युवक संघ की ही महत्वपूर्ण भूमिका थी | स्व.श्री तनसिंह जी की ख्याति एक समाज-संघठक,कर्मठ कार्यकर्त्ता,सुलझे हुए राजनीतीज्ञ,आद्यात्म प्रेमी,गंभीर विचारक और दृढ निश्चयी व्यक्ति के रूप में अधिक रही है किंतु इस प्रशिधि के अतिरिक्त उनके जीवन का एक पक्ष और भी है जिसे विस्मृत नही किया जा सकता | यह एक तथ्य है कि एक कुशल प्रशासक,पटु विधिविज्ञ,सजग पत्रकार और राजस्थानी तथा हिन्दी भाषा के उच्चकोटि के लेखक भी थे | पत्र लेखन में तो उनका कोई जबाब ही नही था अपने मित्रों,सहयोगियों,और सहकर्मियों को उन्होंने हजारों पत्र लिखे जिनमे देश,प्रान्त,समाज और राजपूत जाति के अतीत,वर्तमान और भविष्य का चित्र प्रस्तुत किया गया है | अनेक सामाजिक,राजनैतिक और व्यापारिक कार्यों की व्यस्तता के बावजूद उन्होंने साहित्य,संस्कृति और धार्मिक विषयों पर लिखने के समय निकला | श्री क्षत्रिय युवक संघ के पथ पर चलने वालों पथिकों और आने वाली देश की नई पीढियों की प्रेरणा स्वरूप स्व.श्री तनसिंह जी एक प्रेरणादायक सबल साहित्य का सर्जन कर गए |

  संघप्रमुख 
1. संस्थापक-  स्व.पु.श्री तनसिंह जी
         2.द्वितीय संघप्रमुख-  श्री आयुवान सिंह जी
        3.तृतीय संघप्रमुख-  श्री नारायण सिंह जी 
       4 .चतुर्थ संघप्रमुख-  श्री भगवान सिंह जी 

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                        जीवन परिचय 

                                             स्व.पु.श्री तनसिंह जी: एक अद्भभुत व्यक्तित्व का परिचय

                     वि.सं.१९८० में बाड़मेर जिले के गांव रामदेरिया के ठाकुर बलवंत सिंह जी महेचा की धर्म पत्नी मोतिकंवरजी के गर्भ से तनसिंह जी का जन्म अपने मामा के घर बैरसियाला गांव में हुआ था वे अभी शैशवावस्था में अपने घर के आँगन में चलना ही सीख रहे थे कि उनके पिता मालाणी के ठाकुर बलवंत सिंघजी का निधन हो गया और चार वर्ष से भी कम आयु का बालक तनैराज अपने सिर पर सफ़ेद पाग बाँध कर ठाकुर तनैराज हो गया | मात्र ९०रु वार्षिक आय का ठाकुर | भाग्य ने उनको पैदा करके पालन-पोषण के लिए कठिनाईयों के हाथों सौप दिया |                      घर की माली हालत ठीक न होने के बावजूद भी श्री तनसिंह जी ने अपनी प्राथमिक शिक्षा बाड़मेर से पुरी कर सन १९४२ में चौपासनी स्कूल जोधपुर से अच्छे अंकों के साथ मेट्रिक परीक्षा पास कर सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी होने का गौरव प्राप्त किया,और उच्च शिक्षा के लिए पिलानी चले आए जहाँ उच्च शिक्षा ग्रहण करने बाद नागपुर से उन्होंने वकालत की परीक्षा पास कर सन १९४९ में बाड़मेर आकर वकालत का पेशा अपनाया,पर यह पेशा उन्हें रास नही आया | 25 वर्ष की आयु में बाड़मेर नगर वासियों ने उन्हें बाड़मेर नगर पालिका का अध्यक्ष चुन लिया और 1952 के विधानसभा चुनावों में वे पहली बार बाड़मेर से विधायक चुन कर राजस्थान विधानसभा पहुंचे और 1957 में दुबारा बाड़मेर से विधायक चुने गए | 1962 व 1977 में आप बाड़मेर लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए | 1962 में तन सिंघजी ने दुनिया के सबसे बड़े और विशाल बाड़मेर जैसलमेर निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव मात्र एक जीप,कुछ साथी,सहयोगी स्वयम सेवक,कार्यकर्त्ता,किंतु अपार जन समूह के प्यार और समर्थन से मात्र 9000 रु. खर्च कर सांसद बने |1979 में मध्यावधि चुनावों का फॉर्म भरने से पूर्व अपनी माताश्री से आशीर्वाद लेते समय 7 दिसम्बर 1979 को श्री तनसिंह जी ने अपनी माता की गोद में ही अन्तिम साँस ली | पिलानी के राजपूत छात्रावास में रहते हुए ही श्री तनसिंह जी ने अपने भविष्य के ताने-बाने बुने | यहीं उनका अजीबो-गरीब अनुभूतियों से साक्षात्कार हुआ और समाज की बिखरी हुयी ईंटों से एक भव्य-भवन बनाने का सपना देखा | केवल 22 वर्ष की आयु में ही उनके हृदय में समायी समाज के प्रति व्यथा पिघली जो " श्री क्षत्रिय युवक संघ" के रूप में निश्चित आकार धारण कर एक धारा के रूप में बह निकली | लेकिन अन्य संस्थाओं की तरह फॉर्म भरना,सदस्यता लेना,फीस जमा करना,प्रस्ताव पारित करना,भाषण,चुनाव,नारेबाजी,सभाएं आदि करना श्री तन सिंह जी को निरर्थक लगी और 22 दिसम्बर 1946 को जयपुर के मलसीसर हाउस में नवीन कार्य प्रणाली के साथ "श्री क्षत्रिय युवक संघ " की विधिवत स्थापना की और उसी दिन से संघ में वर्तमान संस्कारमयी मनोवैज्ञानिक कार्य प्रणाली का सूत्रपात हुवा | इस प्रकार क्षत्रिय समाज को श्री तनसिंह जी की अमूल्य देन "श्री क्षत्रिय युवक संघ " अपनी नई प्रणाली लेकर अस्तित्व में आया | राजनीती में रहकर भी उन्होंने राजनीती को कभी अपने ऊपर हावी नही होने दिया | क्षत्रिय युवक संघ के कार्यों में राजनीती भी उनकी सहायक ही बनी रही | सन 1955-56 में विवश होकर राजपूत समाज को राजस्थान में दो बड़े आन्दोलन करने पड़े जो भू-स्वामी आन्दोलन के नाम से विख्यात हुए,दोनों ही आन्दोलनों की पृष्ठभूमि में क्षत्रिय युवक संघ की ही महत्वपूर्ण भूमिका थी |                            स्व.श्री तनसिंह जी की ख्याति एक समाज-संघठक,कर्मठ कार्यकर्त्ता,सुलझे हुए राजनीतीज्ञ,आद्यात्म प्रेमी,गंभीर विचारक और दृढ निश्चयी व्यक्ति के रूप में अधिक रही है किंतु इस प्रशिधि के अतिरिक्त उनके जीवन का एक पक्ष और भी है जिसे विस्मृत नही किया जा सकता | यह एक तथ्य है कि एक कुशल प्रशासक,पटु विधिविज्ञ,सजग पत्रकार और राजस्थानी तथा हिन्दी भाषा के उच्चकोटि के लेखक भी थे | पत्र लेखन में तो उनका कोई जबाब ही नही था अपने मित्रों,सहयोगियों,और सहकर्मियों को उन्होंने हजारों पत्र लिखे जिनमे देश,प्रान्त,समाज और राजपूत जाति के अतीत,वर्तमान और भविष्य का चित्र प्रस्तुत किया गया है | अनेक सामाजिक,राजनैतिक और व्यापारिक कार्यों की व्यस्तता के बावजूद उन्होंने साहित्य,संस्कृति और धार्मिक विषयों पर लिखने के समय निकला |


                    श्री क्षत्रिय युवक संघ के पथ पर चलने वालों पथिकों और आने वाली देश की नई पीढियों की प्रेरणा स्वरूप स्व.श्री तनसिंह जी एक प्रेरणादायक सबल साहित्य का सर्जन कर गए |


                                                  आपके साहित्य:-

   
1-राजस्थान रा पिछोला      2-समाज चरित्र      3- बदलते द्रश्य      4- होनहार के खेल      5- साधक की समस्याएं                           6- शिक्षक की समस्याएं      7- जेल जीवन के संस्मरण      8- लापरवाह के संस्मरण      9-पंछी की राम कहानी                                   10- एक भिखारी की आत्मकथा      11- गीता और समाज सेवा      12- साधना पथ      13- झनकार( तनसिंहजी द्वारा रचित गीतों का संग्रह)


                                                            परिचय :- स्व.आयुवानसिंह हुडील
                               परिचय :-
            कुंवर आयुवानसिंह शेखावत नागौर जिले के हुडील गांव में ठाकुर पहपसिंह शेखावत के ज्येष्ठ पुत्र थे आपका जन्म १७ अक्टूबर १९२० ई.को अपने ननिहाल पाल्यास गांव में हुआ था|आपका परिवार एक साधारण राजपूत परिवार था|आपका विवाह बहुत कम उम्र में ही जब आपने आठवीं उत्तीर्ण की तभी कर दिया|   शिक्षा व अध्यापन कार्य :-                      राजस्थान के ख्यातिप्राप्त विद्यालय चौपासनी, जोधपुर में आठवीं परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद आपकी शादी होने के कारण विद्यालय के नियमों के तहत आपको आगे पढ़ने से रोक दिया गया पर आपकी प्रतिभा व कुशाग्र बुद्धि देखकर तत्कालीन शिक्षा निदेशक जोधपुर व चौपासनी विद्यालय के प्रिंसिपल कर्नल ए.पी.काक्स ने आपको अध्यापक की नौकरी दिला ग्राम चावण्डिया के सरकारी स्कूल में नियुक्ति दिला दी ताकि आप अध्यापन के साथ साथ खुद भी पढ़ सकें| राजकीय सेवा में रहते हुए आपने सन १९४२ में साहित्य रत्न व् उसके बाद प्रथम श्रेणी से हिंदी विषय में एम.ए व एल.एल.बी की परीक्षाएं उत्तीर्ण की|तथा सन १९४८ में आपने सरकारी नौकरी से त्याग पत्र दे दिया|   समाज सेवा के लिए प्रेरित :- सन १९४२ के आरम्भ में ही आपका परिचय तनसिंह जी,बाड़मेर से हुआ | दोनों के ही मन में समाज के प्रति पीड़ा व कुछ कर गुजरने की अभिलाषा थी| इस अभिलाषा को पूर्ण करने हेतु एक संगठन बनाने को दोनों आतुर थे|तनसिंह जी ने पिलानी में पढते हुए "राजपूत नवयुवक मंडल" नाम से एक संगठन बना आयुवानसिंह जी को सूचित किया| इस संगठन के प्रथम जोधपुर अधिवेशन (मई १९४५) में क्षत्रिय युवक संघ नाम दिया गया जिसके प्रथम अध्यक्ष श्री आयुवानसिंह जी चुने गए|बाद में क्षत्रिय युवक संघ में नवीन कार्यप्रणाली की शुरुआत की गयी और आप इस संघ के संघ प्रमुख बने |तथा संघ के बनने से लेकर १९५९ तक क्षत्रिय युवक संघ से जुड़े रहे|  

रामराज्य परिषद से जुड़ राजनीति से जुड़ाव :-

                            देशी रियासतों के विलीनीकरण व राजस्थान के निर्माण की घटनाओं के बाद १९५२ के प्रथम चुनावों की घोषणा हुई इससे कुछ समय पूर्व ही स्वामी करपात्री जी ने धर्म-नियंत्रित राजतन्त्र की मांग के साथ "रामराज्य परिषद" के नाम से एक राजनैतिक पार्टी की स्थापना की|राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ के वर्ण-विहीन हिन्दुवाद से वर्ण-धर्म की स्वीकारोक्ति के साथ धर्म की करपात्रीजी की बात क्षत्रिय युवक संघ के लोगों को अच्छी लगी और वे रामराज्य परिषद से जुड़ गए| क्षत्रिय युवक संघ का साथ मिलते ही रामराज्य परिषद का राजस्थान में विस्तार होने लगा| इस बीच कांग्रेसी नीतियों से असंतुष्ट जोधपुर के महाराजा को कर्नल मोहनसिंह जी के माध्यम से मुलाकात कर श्री आयुवानसिंह जी ने राजनीति में आने को प्रेरित किया और महाराजा जोधपुर ने आपको अपना राजनैतिक सलाहकार बनाया| आपकी सलाह से महाराजा ने ३३ विधानसभा क्षेत्रों में अपने लोगों को समर्थन दिया जिसमे से ३० उम्मीदवार विजयी हुए| किन्तु दुर्भाग्य से चुनाव परिणामों के बाद महाराजा जोधपुर हनुवंतसिंह जी का एक विमान दुर्घटना में देहांत हो गया|   

राजपरिवारों को राजनीति की ओर आकर्षित करना :-                          

         जोधपुर के महाराजा को राजनीति में आने के लिए प्रेरित करना और उनकी सफलता के बाद उनका देहांत होने के बाद राजस्थान के अन्य राजपूत नेता बदली परिस्थितियों में कांग्रेस की ओर चले गए और राजपूत हितों की रक्षा करने हेतु फिर राजनैतिक शून्यता पैदा हो गयी जिसे पूरी करने के लिए आप महाराजा बीकानेर से मिले पर वहां आपको सफलता की कहीं कोई किरण नजर नहीं आई अत: आप जयपुर चले आये और निश्चय किया कि जयपुर राजघराने को आप सक्रिय राजनीति से जोडेंगे|                                       जब चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य ने स्वतंत्र पार्टी के गठन के लिए बम्बई में पहला अधिवेशन आयोजित किया तो आपने बम्बई जाकर राजगोपालाचार्य जी से जयपुर की महारानी गायत्रीदेवी को पार्टी में शामिल करने के लिए आमंत्रित करने के लिए मना लिया, महारानी को राजनीति की ललक आप पहले ही लगा चुके थे|राजगोपालाचार्य जी की आग्रह पर महारानी स्वतंत्र पार्टी में शामिल हो गयी पर समस्या ये थी कि वे न तो हिंदी जानती थी न भाषण देना| तब आपने महारानी को न सिर्फ हिंदी का ज्ञान कराया बल्कि भाषण देने कि कला भी सिखाई|आपके सहयोग और महाराजा मानसिंह जी के राजनैतिक कौशल के बूते महारानी गायत्री देवी एक कुशल नेता बन गयी| महारानी गायत्री देवी को राजनीति में लाकर जयपुर राजघराने को राजनीति से जोड़ने के बाद आपन अपने प्रयासों से महारावल लक्ष्मण सिंह डूंगरपुर को भी राजनीति में खीच लाये| इस तरह से जो राजनैतिक शून्यता महाराजा जोधपुर के आकस्मिक निधन के बाद हो गयी थी उसे आपने भर दिया| और १९६२ के आम चुनावों में भी महारानी गायत्री देवी को वैसी ही सफलता मिली जैसी महाराजा जोधपुर को १९५२ में मिली थी|  

भू-स्वामी आंदोलन में भूमिका :-

                         महाराजा हनुवंतसिंह जोधपुर के निधन के बाद कांग्रेस ने राजनैतिक तोड़ फोड़ व प्रलोभन नीति शुरू कर दी थी|और जागीरदारी उन्मूलन अभियान शुरू कर दिया जिसके चलते जागीरदार अपना पक्ष रखने तत्कालीन गृह-मंत्री प.गोविंदबल्लभ पंत से मिले,साधारण राजपूतों ने भी पंत से मिलने वाले प्रतिनिधि मंडल में शामिल होने की मांग की पर बड़े जागीरदारों ने उन्हें शामिल नहीं होने दिया और उन्होंने पंत से समझोता कर लिया इस समझौते में बड़े जागीरदारों का मुआवजा बढ़ा दिया गया और छोटे राजपूत किसानों का मुआवजा खत्म कर दिया गया|इस तरह कांग्रेस ने बड़े जागीरदारों को जो विपक्ष से चुनाव जीते थे को अपने पक्ष में कर कांग्रेस में मिला लिया |उधर कांग्रेसी सरकार के जागीरदारी उन्मूलन कानून की आड़ लेकर आम छोटे काश्तकार राजपूत की काश्त की जमीनों पर भी किसानों ने कब्जे करने शुरू कर दिया परिणाम स्वरूप गांव-गांव में जमीन के लिए राजपूत समुदाय का दूसरें लोगों से झगड़ा शुरू हो गए इन झगडों में कई हत्याएं हुई| पर बड़े राजपूत जागीरदारों व नेताओं ने छोटे राजपूतों की कोई सहायता नहीं की|आम राजपूत उस समय अशिक्षित था अत:वह कुछ क़ानूनी कार्यवाही समझने में भी अक्षम था|इसी समय सन १९५४ में आयुवानसिंह जी क्षत्रिय युवक संघ के संघ प्रमुख चुने गए उन्होंने समाज की दुर्दशा देख समाज के प्रबुद्ध लोगों से संपर्क कर जागीरदारी उन्मूलन कानून के खिलाफ आंदोलन करने का धरातल तैयार किया|१९५५ में भू-स्वामी संघ के नाम से एक संगठन बनाया गया जिसके अध्यक्ष ठाकुर मदनसिंह दांता थे|व कार्यकारी अध्यक्ष आयुवानसिंह जी को बनाया गया| १ जून १९५५ को इस संगठन ने जागीरों की समाप्ति के विरुद्ध आंदोलन की घोषणा कर दी|पर थोड़े ही समय में भू-स्वामी संघ के अध्यक्ष ठा.मदनसिंह जी कांग्रेसी चालों में फंस गए और उनके समझोता करने के बाद आंदोलन खत्म हो गया| पर आयुवानसिंह जी ने समझोते को क्रियान्वित नहीं करने का आरोप लगाते हुए पुन: संघर्ष का बिगुल बजा दिया|इस बार उन्होंने कांग्रेसी चालों से बचने के लिए यथा संभव उपाय भी कर लिए थे|इस बार बाड़मेर के तनसिंह जी को आन्दोलन का केन्द्रीय संचालनकर्ता बनाया गया|आंदोलन पुरे राजस्थान में फ़ैल गया और करीब तीन लाख राजपूतों ने अपनी गिरफ्तारियां देकर राजस्थान की सभी जेलें भरदी|पच्चीस हजार से अधिक लोगों को जेलों में रखने के बाद बाकि लोगों को सरकार ने कड़ाके की ठण्ड में जंगलों में ले जाकर छोड़ दिया| एक तरफ आंदोलन अपने चरम था आयुवानसिंह जी सहित सभी नेता जेलों में बंद थे|उसी समय आयुवानसिंह जी ने जेल में जाने पहले महाराजा जयपुर को एक पत्र के माध्यम से पूरी वस्तुस्थिति की जानकारी देते हुए राजप्रमुख के नाते प्रधान मंत्री नेहरु से वार्ता करने का आग्रह किया था| साथ ही एक दल ने दिल्ली पहुँच तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री सत्यनारायण सिंह से मुलाकात कर उन्हें प्रधानमंत्री से मिलवाने का आग्रह किया| मिलने पर पूरी वस्तुस्थिति सुन प्रधानमंत्री ने दल को कार्यवाही करने का आश्वाशन दिया और राजप्रमुख से बात की|  

                 राजप्रमुख जयपुर महाराजा ने भी आयुवानसिंह जी के पत्र को पढ़ने के बाद राजपूत आन्दोलान्कारियां का पक्ष लिया व राज्य सरकार पर राजपूतों के उत्पीडन का आरोप लगाया|उनकी बात सुनकर प्रधानमंत्री ने आंदोलनकारियों को दिल्ली बुलाया, बैठक में आयुवानसिंह जी द्वारा मेमोरेंडम पढकर सुनाया गया जिसमे जिस भावनात्मक ढंग से भू-स्वामियों का पक्ष रखा गया था उसे सुनकर प.नेहरु द्रवित हो गए| और उन्होंने कहा-"मैं राजपूतों के साथ अन्याय नहीं होने दूँगा|और इसके बाद नेहरु ने भू-स्वामियों की मांगों को मानते हुए आंदोलन समाप्त करवाने हेतु "नेहरु अवार्ड" की घोषणा कर आंदोलन समाप्त कराया|नेहरु अवार्ड के तहत राजपूतों को कई रियायते व नहरी क्षेत्र में जमीनें दी गयी| पूर्व ठिकानों के कर्मचारियों की पेंशन जारी रखी| जिला स्तर पर जागीरदारों के केसों का निपटारा करने के लिए जागीर कार्यलय खोले गए|  

जेल जीवन :-                       

                  भू-स्वामी आंदोलन के दौरान ही आयुवानसिंह ने भी मार्च १९५६ में जोधपुर में जालोरी गेट के पास स्थित जाड़ेची जी के नोहरे में अपनी गिरफ्तारी दी|पर वार्ता के लिए दिल्ली बुलाने के बाद आपको कार्यकारिणी के ११ सदस्यों के साथ १५ दिन के पैरोल पर ११ अप्रेल १९५६ को जेल से रिहा कर दिया गया|प्रधानमंत्री से मिलने के बाद उनसे आश्वाशन मिलने के बाद आंदोलन समाप्ति घोषणा के बाद पैरोल की अवधि खत्म होने के बाद रिहा हुए सभी लोग वापस जेल चले गए पर आपने पुन: जेल जाने के लिए मना कर दिया पर प.नेहरु द्वारा भेजे गए वरिष्ट नेता रामनारायण चौधरी के आग्रह पर आप १० जून १९५६ को वापस जेल चले गए| समझौता होने व आंदोलन समाप्ति की घोषणा के बाद भी राज्य की कुंठित कांग्रेसी सरकार ने अपनी दमन नीति के तहत भू-स्वामियों को एक माह बाद तक जेलों में बंद रखा| सभी कैदियों को छोड़ने के बाद भी आयुवानसिंह को जेल से रिहा नहीं किया गया|सरकार नियत भांप जब आयुवानसिंह जी ने सुप्रीम कोर्ट में रिट लागने को अपने वकील के पास कागजात भेजे तब इसका पता चलते ही राज्य सरकार ने १ अगस्त १९५६ को आपको तुरंत रिहा कर दिया|

   आपकी प्रकाशित पुस्तकें :-   १- मेरी साधना    २-राजपूत और भविष्य    ३-हमारी ऐतिहासिक भूलें                                                    ४- हठीलो राजस्थान    ५-ममता और कर्तव्य    ६-राजपूत और जागीरें 

  अंतिम समय :- 

                            अत्यधिक श्रम के कारण आपका स्वास्थ्य गिरने लगा| कुछ वर्षों तक आपने जयपुर रहकर अपना इलाज करवाया पर रोग बढ़ने के चलते बाद में आप इलाज के बम्बई गए तब पता चला कि आपको कैंसर है और वह अंतिम स्तर पर जिसका इलाज भारत में संभव नहीं| यह पता चलते ही महारानी गायत्री देवी ने विदेश में जाकर इलाज कराने की बात कही साथ ही विदेश में इलाज पर होने वाले सभी खर्चों को महारानी ने वहन करने की खुद जिम्मेदारी ली| पर आपने कहा-"मैं अपने ही देश में अपने गांव में देह त्यागना चाहता हूँ|" कुछ वर्षों तक रोग की भयंकर वेदना सहन करने के बाद आपने अपने गांव हुडील में ७ जनवरी १९६७ को देह त्याग दी|आपके निधन से एक वृद्ध पिता ने अपना होनहार पुत्र खोया,पत्नी ने अपना पति खोया,चार अल्पवयस्क पुत्रों व तीन पुत्रियों ने अपना पिता खोया व समाज ने खोया अपना महान हितचिन्तक,एक संघर्षशील व्यक्तित्व,एक आदर्श नेता,एक सुवक्ता,एक क्रांतिदर्शी विचारक,एक उत्कृष्ट लेखक,एक निस्वार्थ समाज सेवक व श्री क्षत्रिय युवक संघ ने खोया अपने मास्टर को|

                                                   

                                                                         

                                                                                                     परिचय:-

श्री नारायण सिंह जी

                                                                                                              श्री क्षत्रिय युवक संघ के संघ प्रमुख(1969 to 1989).

                                                                      Biography

श्रद्धेय नारायण सिंह जी का जीवन एक ऐसी यात्रा की कहानी है जो साधारणताआंे से प्रारम्भ होकर असाधारणताओं तक पहुंचने की यात्रा है। 30 जुलाई 1940 मंगलवार को अत्यन्त साधारणताओं के बीच उनका जन्म हुआ। एक अत्यन्त साधारण परिवार, गांव मंे रहने वाला निम्न मध्यम वर्ग का राजपूत परिवार। पिता हरी सिंह जी गांव के एक साधारण राजपूत। चूरू जिले की सुजानगढ तहसील का एक साधारण सा मरूस्थलीय गांवा रेड़ा उनका जन्म स्थान था। बीकानेर उन्हें शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेजा गया। उन्होंने दसवीं तक शिक्षा बीकानेर में ही प्राप्त की। पढने में भी होशियार थे और विद्यालय की एनसीसी, स्काउटिंग आदि गतिविधियों में भी अग्रणी रहते थे। सन् 1950 में मात्र 10 वर्ष की उम्र में बीकानेर में लगे एक प्राथमिक प्रशिक्षण शिविर से उनकी संघ यात्रा प्रारम्भ हुई। वह संघ की शिविर शृंखला का 23वां था और वे 882वें व्यक्ति थे जो संघ के शिविरों में प्रशिक्षण प्राप्त करने आए थे। अपनी पाठशाला के अतिरिक्त वे छात्रावास में रहते थे और कुछ न कुछ चिन्तन मनन चलता रहता था। वे नित्य डायरी लिखा करते थे और उनकी डायरी में स्वयं अपने ही ऊपर टिप्पणियां हुआ करती थी। यह प्रक्रिया है स्वाध्याय की, स्वाध्याय अर्थात स्वयं का अध्ययन। आत्म निरीक्षण। और इसी आत्म निरीक्षण ने ही उन्हें साधारणताओं से असाधारणताओं में पहुंचा दिया। घर की परिस्थितियों के कारण दसवीं कक्षा के बाद वे अध्यापक बन राजकीय सेवा में चले गए। उनको बाहर के एक छोटे गांव में लगाया गया, जहां संघ का कार्य करने के लिए कोई कार्यक्षेत्र नहीं था अतः वे व्यथित रहा करते थे। बीच-2 में छुट्टी का अवसर देखकर अपनी उस व्यथा को मिटाने को बीकानेर आ जाते थे। इसी व्यथा और संघ के प्रति छटपटाहट ने ही उन्हें साधारणताओं से असाधारणताओं में धकेलने का कार्य किया।  सन् 1959 के मई माह में संघ का उच्च प्रशिक्षण शिविर हल्दीघाटी में लगा। उसी शिविर में उन्होंने यह निर्णय ले लिया कि पू. तनसिंह जी के सानिध्य में रहकर अब जीवन भर संघ का कार्य करना है। घर के सबसे बड़े लड़के और शादीशुदा। विपरीत घरेलु परिस्थितियां होते हुए भी लगी नौकरी छोड़कर ऐसा निर्णय लेना सभी को आश्चर्य मंें डाल सकता है। लेकिन तनसिह जी के साथ रहने में ही मेरा कल्याण है, यह निर्णय, यह पकड़ बहुत ही समझदारी की पकड़ थी तथा 19 वर्ष के युवक का यह अत्यन्त साहसिक कदम था। साधारणतया कोई ऐसा निर्णय ले नहीं पाता है। हम में से भी कई लोगों के इस प्रकार के भाव उमड़ते हैं लेकिन जीवन की कठिन पगडण्डियों पर वह भाव धुमिल होने लगता है। हमें समर्पण के बाद भी भय है – हमारे जीवनयापन, कुटुम्ब पालन व भविष्य की समस्याओं का। हम तो चाहते हैं कि मेरी साधना भी चलती रहे और दूसरी तरफ ये सब भी सुरक्षित रहे लेकिन यह संभव नहीं है, यह तो साधारणता में ही जीना है। लेकिन नारायण सिंह जी का जीवन साधारणता से असाधारणता की ओर बढने का नाम है। 19 वर्ष के उस युवक के सामने सारा जीवन चुनौति बनकर खड़ा है। विद्याध्ययन, नौकरी, कुटुम्बपालन आदि सारी समस्याएं जो एक मध्यम वर्ग के व्यक्ति के सामने होती हैं वे सभी उनके सामने मुंह खोले खड़ी थीं। लेकिन उनका संकल्प, उनका निर्णय, उनका समर्पण इतन पक्का था कि उस दिन उस घड़ी से लेकर मृत्युपर्यन्त उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। तनसिंह जी के साथ रहना कोई आसान काम नहीं था। अपने साथ रहने वालों को वे मांजकर स्वच्छ बनाते थे, निर्मल बनाना चाहते थे। और मांजने की क्रिया सदैव कष्टकारी हुआ करती है। तनसिंह जी के समीप अनेक लोग आए और अधिकांश इन कष्टों के कारण भाग छूटते थे। नारायण सिंह जी को तो स्वयं ही निर्मल बनना था, सरल बनना था, अतः सत्य की ओर ले चलने वाले के साथ रहने में आने वाले कष्ट उन्हें विचलित कैसे कर सकते थे। अपनी इस यात्रा में वे आदर्श स्वयंसेवक बने। एक अच्छा सहयोगी, अधिकारी या शिक्षक बनने से पहले आदर्श स्वयंसेवक बनना पड़ता है। जो स्वयं आज्ञापालन नहीं कर सकता वह दूसरों से आज्ञापालन करवाले इसकी सम्भावना बहुत कम है। उनका आज्ञापालन, उनका सेवाभाव, उनकी निरन्तर कर्मठता, उनकी अटूट लगन, उनकी तत्परता तथा उनकी सजगता ने उनको एक आदर्श स्वयंसेवक के रूप में प्रतिष्ठापित किया। शिविरों में वे एक आदर्श घटप्रमुख के रूप में भी प्रतिष्ठापित हुए। अपने घट के लोगों को वे इस प्रकार से बांध लेते थे कि वे लोग संघ से जुड़ जाते थे। शिक्षक के रूप में शिक्षण को रोचक बनाने के लिए अनेकों प्रयोग किए जिससे कि 18-18 घण्टे व्यस्त कार्यक्रमों में शिक्षार्थीयों को ऊब नहीं आए, थकावट नहीं आए। प्रत्येक कार्यक्रम में रोचकता बनी रहे इसके लिए कार्यक्रमों और चर्चाओं आदि के वर्गीकरण कर उन्होंने अन्य लोगों के लिए शिक्षण का कार्य सुगम बना दिया। कर्मठता ऐसी कि 4-4 महिने लगातार एक के बाद एक शिविर और बीच के दिनों में शाखाओं के दौरों में अकेले व्यस्त रहते थे। और कभी भी न थकान की शिकायत और न ही अकेलेपन की शिकायत। आज भी एक साथ 20-20 शिविर लगते हैं लेकिन अनेक लोग हैं जो ये कार्य कर रहे हैं। वे संकल्प के धनी थे और उसी के अनुरूप स्वयं को ढाल लिया। सच्चे अर्थों में जीवन को एक भी दिन, शक्ति का एक भी अणु, द्रव्य का एक भी पैसा तथा हृदय का एक भी भाव संघ से छुपाकर न रखने वाला जीवन बना लिया था अपना। संघ के कार्य में इतनी व्यस्तता रहती थी कि कई बार वर्ष-वर्ष भर तक घर नहीं जा पाते थे। निरन्तर संघ कार्य में लगे रहते थे। माता-पिता, पत्नी, संतान, बंधु-बांधवों आदि का कोई भी आकर्षण ऐसा नहीं था जो संघ की आवश्यकतओं के आकर्षण को कम कर सके। सन् 1963 से 1975 तक वे संघशक्ति के सम्पाकद रहे। और कुशलता पूर्वक सम्पादन कार्य किया। 1969 के बोरून्दा ओटीसी में वे मात्र 29 वर्ष की उम्र में श्री क्षत्रिय युवक संघ के संघप्रमुख चुने गए। उसके बाद 1974, 1980 व 1985 में पुनः संघप्रमुख चुने गए। इस प्रकार 10 वर्ष पू. तनसिंह जी के सान्निध्य मेें और 10 वर्ष स्वतन्त्र रूप से संघ को नेतृत्व प्रदान किया। एक व्यापारी के रूप में कुशलतापूर्वक व्यापार का संचालन कर कुशल प्रशासक का चातुर्य दर्शाया। व्यापार में लेखे जोखे के कार्य को पहले कहीं नहीं सीखा लेकिन उसमें भी ऐसी निपुणता हासिल की कि लेखा विशेषज्ञ भी आश्चर्यचकित थे। साथी लोग जब हिसाब किताब में कहीं उलझ जाते थे तो दूर बैठे ही कुछ जानकारियां हासिल कर वे उन्हें सुलझा देते थे। उनको जीवन में जो भी दायित्व मिला उसमें उन्होंने सदैव विशिष्ठता प्राप्त की।  श्री क्षत्रिय युवक संघ का मार्ग आध्यात्मिक मार्ग है। सम्पूर्ण योग मार्ग है। जो भी इसे पूर्ण समर्पण भाव से स्वीकार कर चल पड़ता है उसे ईश्वरीय तत्व को प्राप्त कर सकता है। इसी मार्ग से पाया नारायण सिंह जी ने। उन्हें स्वतः ही योगिक क्रियाएं प्राप्त होने लगी। इसके फलस्वरूप उनमें चमत्कारी परिवर्तन आरम्भ होगए। उस समय में उनके द्वारा किए गए सहगायनों के अर्थों चर्चाओं में योग प्रगट होने लगा। उनकी साधना बड़ी कष्ट दायक थी किन्तु परिणाम अत्यन्त आनन्ददायक थे। संघ में एक नया उत्साह का संचार हुआ कि यह मार्ग हमें भी इस स्थिति तक पहुंचा सकता है बस कमी है तो लगन की। 1980 से 1989 का समय संघ के लिए अत्यन्त महत्व का समय रहेगा। संघ व्यवहारिक रूप से पारिवारिक भावना से बंधकर एक सच्चे परिवार का रूप इसी समय ले सका। सबको एक सूत्र में बांधकर इतना मजबूत बना दिया कि वज्रपात भी उसका कुछ न बिगाड़ सके।  आज जयन्ती के अवसर पर श्रद्धा सुमन अर्पित करते समय जैसे नारायण सिह जी यही कह रहे हों कि मुझे भी तुम्हारी ही तरह संघ में आने का अवसर मिला, मुझे भी संघ में भागीरथी नजर आई, मैंने सोचा इसमें डूबकी लगालंू। तुम्हारी ही तरह मेरे सामने भी कई विकल्प थे। एक तरफ परिवार , सांसारिक प्रलोभन से भरे अनेक विकल्प, तो दूसरी तरफ इस भागीरथी में आकण्ठ डूबकर स्वयं के अस्तित्व को समाप्त कर सच्चा मोती प्राप्त कर लेने का। मैने डूबना स्वीकार किया और उसी क्षण मेरे जीवन ने नया मोड़ ले लिया। ऐसा सब कर सकते हैं लेकिन इस अनोखे सत्संग की कीमत है बिना शर्त जीवन देना।



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